Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 44, Verse 37
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 44, verse 37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
अवतीर्णस्तदाऽज्ञानात्तथैव सुखमस्मृतम् ।
गर्भनिद्राव्यपगमे वपुः पश्यति भास्वरम् ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रथम कल्प से लेकर प्रतिदिन सोकर उठे हुए उसके स्वदेह कल्पनाक्रम को दिखलाते है ।
जब यह ब्रह्म पद से इस प्रथमरूप से ([--)) अवतीर्णं हुआ, तभी से लेकर अज्ञानवश ब्रह्माण्डगर्भं
में सुषुप्ति सुख से उपलक्षित अपने पूर्व वास्तविक स्वरूप के ओर देहव्यवहार आदि के अस्मरणरूप
सुषुप्ति को प्राप्त हुआ ॥३ ६॥ गर्भनिद्रा के हटने पर वह अपने प्रकाशमय स्वरूप को जो प्राण, अपान,
के प्रवाह से परिपूर्ण था, जो पंचमहाभूतों के स्वच्छ हिस्सों से मानों बना था उसे देखता है