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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 45

चौवालीसवाँ सर्ग समाप्त पैतालीसवों सर्ग ध्यानरूपी वृक्ष के ऊपर मन को चढ़ाने का क्रम तथा उत्तरोत्तर भूमिकाओं में आरूढ हो रहे मन का सुखोत्कर्ष यह वर्णन ।

64 verse-groups

  1. Verse 1महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे शत्रुनाशक श्रीरामजी, इस तरह ध्यानरूपी कल्पवृक्ष के ऊपर विश्रा…
  2. Verse 2अनन्तर कुछ समय के बाद वह विवेकपूर्णं ध्यानवृक्ष पाँच कोशो के भीतर स्थित पारमार्थिक आत्मस्…
  3. Verse 3चतुर्थ शूमिका में अक्तभावना दोष का थोड़ा विनाश रहता है और मन्द अन्धकार में घट आदि की जेस़…
  4. Verse 4बड़े भारी अध्यवसाय (प्रयत्न) से भरा तथा अपने सब धर्मों को छोड़ देनेवाला यानी परमविरक्त पु…
  5. Verse 5केसे चढ़ता है, इसे कहते हैं / जो अध्यवसायी जड़ता है, वह सबसे पहले विवेक वृक्ष के ऊपर अपना…
  6. Verse 6उक्त उत्तम फल की इच्छा से विवेकरूपी वृक्ष पर चढ़ा हुआ पुरुष अपने पहले के संस्कारों को उस…
  7. Verse 7यदि उसे कुछ पहले का स्मरण हुआ, तो भी वह जोर से हँसने लग जाता है और अपने को ऊँचे विवेकवृक्…
  8. Verse 8सम्पूर्णं भूतो पर करुणा आदिरूप (&) इस वृक्ष की शाखाओं में भ्रमण कर रहा यानी व्युत्थानकाल…
  9. Verse 9सद्बुद्धिरूपी चन्द्रमा को निगल जानेवाली अमावस्या की पंक्तिभूत तथा दुःखरूपी चन्द्रमा में अ…
  10. Verse 10यह न तो प्राप्त वस्तुओं की उपेक्षा करता है ओर न अप्राप्त वस्तुओं की अभिलाषा करता है, बल्क…
  11. Verse 11अध्यात्मशार्त्र से अतिरिक्त शास्त्रों के अनुसार प्रवृति होने पर प्राणियों को ब्रह्मलोकपर्…
  12. Verse 12भयंकर विषवृक्षलताओं में विकसित विषमय पुष्पसमूहरूपी दांतों से युक्त अपनी पूर्वोक्त सातों अ…
  13. Verse 13उस ध्यानरूपी वृक्ष के उन स्कन्धप्रदेशों में यानी उत्तरोत्तर भिन्न-भिन्न भूमिकाओं में आरूढ…
  14. Verse 14पुत्र, सत्री, मित्र तथा धन आदि सभी पदार्थों को यह जन्मान्तर में प्राप्त किये गये या स्वप्…
  15. Verse 15दूसरों को खुश करना ही जिसमें प्रधान कार्य हे ऐसी राग, द्वेष, भय, उन्माद, मान तथा मोह की म…
  16. Verse 16उन्मत्त के चेष्टित के समान आकारवाली, सामने स्थित भी तरंग के समान क्षणभंगुर आधारवाली संसार…
  17. Verse 17अपूर्वं पद में विश्रान्त जीवन धारण कर रहा भी मृतक के सदृश वह योगी स्त्री, पुत्र आदि सांसा…
  18. Verse 18किन्तु केवल शुद्ध बोधमय, महाउन्नत उस एक आत्मज्ञान रूप फल में ही एकमात्र अपने चित्त को लगा…
  19. Verse 19अपनी पूर्वावस्था की आपत्तियों का (4) आदिपद से यहाँ “अभयं सत्त्वसंशुद्धिज्ञिनियोगव्यवस्थित…
  20. Verse 20जैसे सोया हुआ पुरुष किसी से जगा दिये जाने पर निद्रासुख के विच्छेद से उद्वेग को प्राप्त हो…
  21. Verse 21बहुत दूर का रास्ता तय करनेवाले पथिक की तरह चिरकालतक के मूर्खता प्रयुक्त अनेक जन्म-मरण-परम…
  22. Verse 22प्राणधारणमात्र से अन्य पुरुषों के समान भी यह अपने भीतर अहंभाव के अभिमान से बिलकुल शून्य ह…
  23. Verse 23पूर्वाभ्यास के बल से धीरे-धीरे बाह्य पदार्थो में हो रही विरक्ति का, यथाप्राप्त भोगों पर प…
  24. Verse 24परमार्थरूप फल प्रदान करनेवाली उस महापदवी के ऊपर चल रहा यह ज्ञानी पुरुष वाणी के भी अगोचर छ…
  25. Verse 25बिना प्रयत्न किये ही कहीं से यानी दूसरों के प्रयत्न से दैववशात्‌ प्राप्त हुए भोगों मे यह…
  26. Verse 26संसार की वृत्तियों में सुप्त, क्षीण उन्मत्त की तरह आनन्दयुक्त तथा भीतर में पूर्ण मनवाला य…
  27. Verse 27वह ज्ञानी पुरुष उस तरह के स्वरूप में पहुँचकर क्रमशः मोक्षरूप परमार्थफल के निकट ऐसे प्राप्…
  28. Verse 28उस योगी की स्रप्तमभूमिका में कैसी स्थिति रहती है यह बत्लाते है/ तदनन्तर सप्तमभूमिका में प…
  29. Verse 29हे श्रीरामचन्द्रजी, संकल्पित पदार्थों के परित्याग से दिन-पर-दिन जो विस्तृत शुद्ध आत्मस्वभ…
  30. Verse 30त्रिपुटीरूपी अपने अर्थ को विलीन कर भेदबुद्धि अभेदरूप में ही जो अवशिष्ट रह जाती है यानी त्…
  31. Verse 31हे श्रीरामचन्द्रजी (५) “अखिलां बुद्धि विहाय” इससे इस योगी की आत्यन्तिक वासना का क्षय और म…
  32. Verse 32दृश्य तत्त्व के शोधन से सन्मात्र परमार्थ ओर द्रष्टा के तत्त्व के शोधन से चिन्मात्र परमार्…
  33. Verse 33खींचकर छोड़ देने के पश्चात्‌ धनुष की स्थिति की तरह विक्त की अखण्डाकार वृत्ति का उपरम हो ज…
  34. Verse 34जैसे पत्थर या काठ के स्तम्भ में स्थित अप्रकटित अंगोवाली मूर्ति न तो सद्रूप है ओर न असद्रू…
  35. Verse 35इस तरह यह निश्चित है कि बोध होने के पहले यानी अज्ञानदशा में प्रपंचसहित ब्रह्म में निष्प्र…
  36. Verse 36सोकर उठने के बाद जैसे पुरुष को स्वाप्नित पदार्थों में तुच्छ बुद्धि होने से आत्यन्तिक विरक…
  37. Verse 37यदि ध्यान नहीं है, तो फिर ध्यान के विषय ब्रह्म में समाधि कैसे 2 क्योंकि धारणा, ध्यान और स…
  38. Verse 38(तदेवा्थमात्रनिसि स्वरुपशून्यं समाधिः“ भगवान्‌ पतंजलि के उक्त वचन का भी दष्टा ओर दृश्य को…
  39. Verse 39दृश्य पदार्थों मे जो विरक्तिभाव है यानी जड़ता आदि दुःखों के त्यागपूर्वक एकमात्र चिदानन्दै…
  40. Verse 40अज्ञानी को ही संसार के पदार्थ रुचिकर प्रतीत होते हैं, तत्त्वज्ञानी को नहीं । क्योकि जो अम…
  41. Verse 41यदि बार-बार अपने स्वरूप के अनुसन्धान को (स्मरण को) ही आप ध्यान स्रमझते हैं; तो वह जागरूक…
  42. Verse 42(वितृष्णस्य' (तृष्णारहित) इस विशेषण का तात्पर्य खोलते हैं । आत्मस्वरूपानुसन्धानरूपी ध्यान…
  43. Verse 43अथवा ज्ञानी की तृष्णा भी अनन्त है, क्योंकि यह स्वयं विभागरहित अपरिच्छिन्न आत्मस्वरूप से ह…
  44. Verse 44पंखरहित पर्वत की स्थिति की तरह बाह्य पदार्थों मे तृष्णारहित उस ज्ञानी का अनुभवरूप अनन्त ध…
  45. Verse 45एकमात्र यही कारण है कि जब तक शुद्ध बोधस्वरूप आत्मा का उदय नहीं हो पाता, तभी तक समाधि के ल…
  46. Verse 46विक्षेप पैदा करनेवाले रागादि दोषों का जो आत्यन्तिक विनाश ह उीको समाधि कहते हैं; यह तो तत्…
  47. Verse 47हे श्रीरामचन्द्रजी, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि विषयों से वैराग्य के अत्यन्त दृढ़ हो जान…
  48. Verse 48व्र के समान ढ़ विक्यो से विरक्ति भी ध्यान ही हैं, अतः उसकी प्रशंसा करते है / हे श्रीरामचन…
  49. Verse 49यही कारण हैं कि तत्त्वज्ञ पुरुषों के लिए विश्व शब्द किसी अर्थ को नहीं रखता इसका अर्थ बाधि…
  50. Verse 50क्योकि मनन आदि बोधरूप भूमियों में आरूढ़ हो रहे विवेकियों या आत्मसाक्षात्कारादि भूमियों मे…
  51. Verse 51आत्मस्वरुप में विश्रान्त होने के उपाय बतलाते हैं / इस आत्मस्वरूप में विश्रान्ति का प्रथम…
  52. Verse 52नित्य अपरोक्ष, अपरिच्छिन्न यही ब्रह्मचिति जीव नामक अपने प्रतिबिम्ब के दर्पणस्वरूप अन्तःकर…
  53. Verse 53इस तरह अनादि काल से इस संसार में चक्कर लगा रहे जीवों के बीच में भाग्यवशात्‌ किसी एकको ज्ञ…
  54. Verse 54तब ज्ञानरूपी अग्नि से भस्मीभूत हुई जगत्‌-रूपी सब रुई बुद्धिरूपी झंझावात से शीघ्र उड़कर पर…
  55. Verse 55श्रान्ति के निवारण में समर्था जो बोध हैं वही मूलअज्ञानकृप जडता के विनाथमेहेतुङः नकि ऊपरी…
  56. Verse 56अज्ञानी के अभिनिवेशरूपी अज्ञान से जैसे संसार की भ्रान्ति प्रतिदिन की अभिवृद्धि से बढ़ती ह…
  57. Verses 57–58अज्ञान के दग्ध होते समय तत्त्वज्ञानी को जगत्‌ का भान कैसा होता है 2 यह कहते है / अज्ञानी…
  58. Verse 59ज्ञानी पुरुष के चित्त में जगत्‌ की ज्ञप्ति तथा अभिलाषा आदि चितुप्रकाशस्वरूप ही भासता है ।…
  59. Verse 60ज्ञानी को तो परमप्रकाशस्वरूप इस संसार की कोई अपूर्व स्थिति भासती है । ओर अर्धज्ञानी पुरुष…
  60. Verse 61बोध होने के कारण वह अर्धज्ञानी पुरुष, नानाविध भावपदार्थों से परिपूर्ण इस जगत्‌ को एक आत्म…
  61. Verse 62ज्ञान ओर अज्ञान इन दोनों में जो भाग इसका प्रबल पड़ता है तद्रूप होकर यह रहता है, किन्तु जि…
  62. Verse 63जैसे कि सप्तम भूमिका में आरूढ पुरुष जाग्रत्‌, स्वप्न और सुषुप्ति को नहीं देखता | (ध्यानरू…
  63. Verse 64इस मन के अवस्तुरूप होने से इसके विद्यमान रहते मोक्ष नहीं होता, किन्तु इसके स्वरूप का नाश…
  64. Verse 65इतका सारांश यह निकला कि यह मन का नाश ही मनरुपीम॒य के बहाने वर्णित हुए आत्मा का मोक्ष हैं…