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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 61

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, verse 61 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 61

संस्कृत श्लोक

बोधादेकं जगद्भावैर्जाड्यान्नात्मत्वमागतम् । मिथो बोधाद्द्विवदति मैत्रीं भजति बोधतः ॥ ६१ ॥

हिन्दी अर्थ

बोध होने के कारण वह अर्धज्ञानी पुरुष, नानाविध भावपदार्थों से परिपूर्ण इस जगत्‌ को एक आत्मतत्त्वरूप समझता है तथा जडता के विद्यमान रहने से वह इस जगत्‌ को एक आत्मरूप से स्थित नहीं भी देखता है । चूँकि उसमें दोनों स्वभाव उपस्थित रहते हैं, इसलिए जब उसमें बोध की अधिकता होती है तब वह सभी प्राणियों में अत्यन्त मित्रता का बर्ताव करने लग जाता है-अपने ही समान उन्हे भी सुख-दुःख से युक्त समझने लगता है और जब उसमें अज्ञानांश की अधिकता होती है तब वह परस्पर विवाद करने लगता है