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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 48

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, verse 48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 48

संस्कृत श्लोक

परं विषयवैतृष्ण्यं वज्रध्यानं प्रसाध्यताम् । भेदे विगलिते ज्ञानादन्यध्यानतृणेन किम् ॥ ४८ ॥

हिन्दी अर्थ

व्र के समान ढ़ विक्यो से विरक्ति भी ध्यान ही हैं, अतः उसकी प्रशंसा करते है / हे श्रीरामचन्द्रजी, विषयों में उत्पन्न हुए अत्यन्त दृढ़ वैराग्य को ही आप वज्र के समान दृढ़ ध्यानरूप बना लीजिये, क्योकि आत्मज्ञान से भेद के नष्ट हो जाने पर तृण के तुल्य दूसरे पदार्थों के ध्यान से कौन-सा मतलब सिद्ध होगा ?