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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 41

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, verse 41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 41

संस्कृत श्लोक

वितृष्णस्यात्मनिष्ठत्वादेषणात्रयमुज्झतः । ज्ञस्याप्यनिच्छतो ध्यानमर्थायातं प्रवर्तते ॥ ४१ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि बार-बार अपने स्वरूप के अनुसन्धान को (स्मरण को) ही आप ध्यान स्रमझते हैं; तो वह जागरूक पुरुष के जाग्रतात्मा में हुए स्वरूप अनुसन्धान की तरह विद्वान्‌ महानुभावो को सहज- सिद्ध हैं, यह कहते हैं । तृष्णारहित, आत्मनिष्ठ होने के कारण तीनों एषणाओं का त्याग कर चुके तत्त्वज्ञानी योगी का ध्यान इच्छा न रहने पर भी अपने-आप स्वयं होता रहता है