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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 52

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, verse 52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 52

संस्कृत श्लोक

ध्यानं तृतीयं निर्वाणे श्रेष्ठस्तत्रोत्तरोत्तरः । जीवादर्शान्मिथो रूपं गृह्णात्येषा महद्वपुः ॥ ५२ ॥

हिन्दी अर्थ

नित्य अपरोक्ष, अपरिच्छिन्न यही ब्रह्मचिति जीव नामक अपने प्रतिबिम्ब के दर्पणस्वरूप अन्तःकरणभूत उपाधि के कारण परस्पर भिन्न-भिन्नरूप को ग्रहण करती है । प्रिय तथा अप्रिय विषयों का संघटन करनेवाले ब्रह्मा से लेकर तृणपर्यन्त शेष विशेष पदार्थों से सम्बन्ध पाकर अपने-अपने कर्मो की विचित्रता के कारण सम और विषम भिन्न- भिन्न शरीरो में उदित होती है