Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 59
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, verse 59 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 59
संस्कृत श्लोक
भासते भामयी वाञ्छा जगज्ज्ञप्तिर्ज्ञचेतसि ।
नूनं बोधेऽविमूढस्य नाहंता न जगत्स्थितिः ॥ ५९ ॥
हिन्दी अर्थ
ज्ञानी पुरुष के चित्त में जगत् की ज्ञप्ति तथा अभिलाषा आदि चितुप्रकाशस्वरूप ही भासता है ।
इसमें सन्देह नहीं कि बोध होने पर ज्ञानी का न तो अहंकार रहता है ओर न जगत् की स्थिति
ही रहती है