Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 37
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, verse 37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
दृश्यस्य बोधताबोधो यो बोधादपरिक्षयः ।
स समाधानशब्देन प्रोच्यते सुसमाहितेः ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि ध्यान नहीं है, तो फिर ध्यान के विषय ब्रह्म में समाधि कैसे 2 क्योंकि धारणा, ध्यान और
समाधि- इन तीनों का विषय एक ही निश्चित है। देखिये भगवान् पतंजलि के खूत्र- देशबन्धश्चित्तस्य
(०) जनता में प्रसिद्धि प्राप्त करने की अभिलाषा का नाम लोकैषणा है, मुझे सुन्दर स्त्री प्राप्त
होवे इस इच्छा का नाम दारेषणा है तथा मैं इस संसार मेँ खूब धनी हो जाऊँ इस अभिलाषा नाम
धनैषणा है । पुत्रप्राप्ति की अभिलाषा स्त्ीप्राप्ति के अधीन है, अतः उसका पृथक् ग्रहण नहीं है
। यहाँ कहने का तात्पर्य यह है कि स्त्री-अभिलाषा के परित्याग से पुत्रपराप्ति की अभिलाषा का
त्याग तो अर्थतः लब्ध है । इन तीन एषणाओं मेँ ही सबका अन्तभवि है ।
धारणा (ततर प्रत्ययैकतानता ध्यानम् ^ तदेवा्थमात्रनिर्भाप्त स्वरूपशून्यमिव समाधिः“ त्रयमेकत्र
संयम: / इस पर कहते हैं ।
प्रमाता, प्रमेय और प्रमाण स्वरूप या ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञानस्वरूप जगत् का एकमात्र
साक्षिस्वरूपज्ञानरूप से जो बोध है वही यथार्थ स्वभाव में उत्तम स्थिति का कारण होने से 'सुष्ठु-
सम्यग् आधानं समाधिः" - ऐसा विग्रह करने से "समाधान शब्द से कहा जाता है । हे श्रीरामचन्द्रजी,
उस तरह के बोधस्वभाव से ही यह सारा प्रपंच शाश्वत होता है