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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 46

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, verse 46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 46

संस्कृत श्लोक

परं विषयवैतृष्ण्यं समाधानमुदाहृतम् । आहृतं येन तन्नूनं तस्मै नृब्रह्मणे नमः ॥ ४६ ॥

हिन्दी अर्थ

विक्षेप पैदा करनेवाले रागादि दोषों का जो आत्यन्तिक विनाश ह उीको समाधि कहते हैं; यह तो तत्वज्ञ पुरुषों में ही संभव है, अतः उन तत्वज्ञ महानुभावो को नमस्कार करना चाहिए, यह कहते हैं / विषयों से जो आत्यन्तिक विरक्ति है, अर्थात्‌ बाह्यपदार्थों की तृष्णा का जो आत्यन्तिक विनाश है, वही समाधि कही गई हे । जिसको सांसारिक पदार्थों में अत्यन्त वैराग्य हो गया है, उस ब्रह्मरूपी मनुष्य को नमस्कार है