Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
उपेक्षते न संप्राप्तं नाप्राप्तमभिवाञ्छति ।
सोमसौम्यो भवत्यन्तः शीतलः सर्ववृत्तिषु ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
यह न तो प्राप्त वस्तुओं की उपेक्षा करता है ओर
न अप्राप्त वस्तुओं की अभिलाषा करता है, बल्कि सम्पूर्ण वृत्तियों मे चन्द्रमा की नाई सौम्य तथा
शीतल अन्तःकरण से युक्त होकर स्थित रहता है