Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verses 57–58
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, verses 57–58 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 57,58
संस्कृत श्लोक
तथा ज्ञस्य परिज्ञानात्तदज्ञप्तिः प्रदीप्यते ।
तज्ज्ञस्याज्ञजगज्ज्ञप्तिशब्दार्थरहिता स्थिता ॥ ५७ ॥
यथास्थितैव त्रिजगज्ज्ञप्तिश्चित्र इवोदिता ।
शून्यत्वेनैव रचिता सुप्तत्वेनेव निर्मिता ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
अज्ञान के दग्ध होते समय तत्त्वज्ञानी को जगत् का भान कैसा होता है 2 यह कहते है /
अज्ञानी को जैसा जगत् का ज्ञान स्थित रहता है उस अज्ञानी के जगत्-ज्ञान शब्दार्थ से
रहित ही स्वस्वरूप में स्थित, चित्र में लिखित-जैसा, सुप्त पुरुष के द्वारा निर्मित के सदृश
एकमात्र शून्यरूप से विरचित ही तीनों जगत् का भान तत्त्वज्ञानी पुरुष को होता है