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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 56

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, verse 56 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 56

संस्कृत श्लोक

निर्मूलापि जगद्भ्रान्तिर्येनाशु न विलीयते । यथाज्ञस्य जगज्ज्ञप्तिरपज्ञानात्प्रदीप्यते ॥ ५६ ॥

हिन्दी अर्थ

अज्ञानी के अभिनिवेशरूपी अज्ञान से जैसे संसार की भ्रान्ति प्रतिदिन की अभिवृद्धि से बढ़ती ही जाती है वैसे ही तत्त्वज्ञानी के परिज्ञान की दिन प्रतिदिन अभिवृद्धि से उत्तरोत्तर भूमिकाओं में अज्ञान भी नित्यप्रति अधिक दग्ध होता जाता है