Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 63
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, verse 63 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 63
संस्कृत श्लोक
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तानां स्वभावमिव तुर्यगः ।
वासनैव मनः सेयं स्वविचारेण नश्यति ॥ ६३ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे कि सप्तम भूमिका में आरूढ पुरुष जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति को नहीं
देखता | (ध्यानरूयी वृक्ष के नीचे मनरुपी हरिण को विश्रान्ति ग्राप्त होती है, इसी को दूसरे
रूपये परमपुरुषार्थफल की प्राप्ति बतलानी चाहिए, लेकिन यह न कहकर मनके नाश को ही
मोक्षरुपी पुरुषार्थ कैसे कहते हैं; यदि यह क आशंका करे, तो इस पर कहते हैं // हे
श्रीरामचन्द्रजी, वह वासना ही मनरूपी मृग है ओर यह अपने विचार से ही नष्ट होता है