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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 33

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, verse 33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 33

संस्कृत श्लोक

तज्ज्ञस्याकृष्टमुक्तस्य स्वभावेषूपमां विना । स्थितिः स्रग्दामकस्येव न संभवति काचन ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

खींचकर छोड़ देने के पश्चात्‌ धनुष की स्थिति की तरह विक्त की अखण्डाकार वृत्ति का उपरम हो जाने पर पुनः उसकी पूर्वावस्था की स्थिति कदापि नहीं आ सकती, यह आशंका कर कहते हैं । आत्म-साक्षात्कार कर चुके योगी के चित्त की स्थिति, खींचकर छोड़ देने के बाद धनुष आदि कठोर वस्तुओं की उपमा से रहित अत्यन्त कोमल फूलों की माला की तरह होती है, किसी दूसरी स्थिति का संभव नहीं है । पृथ्वी पर पड़ी फूल की माला सीधी-टेढ़ी चाहे जिस किसी तरह से स्थापित हो जाने पर वह वैसी ही ज्यों-की-त्यों स्थित रहती है । धनुष की तरह उसकी पूर्वावस्था नहीं आती । धनुष तो खींचकर छोड़ देने के बाद ज्यों-का-त्यों हो जाता है, यह तात्पर्य है