Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, verse 19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
स्मृत्वा स्मृत्वापदः पूर्व संतोषामृतपोषितः ।
अर्थानामप्यनर्थानां नाशेषु परितुष्यति ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
अपनी पूर्वावस्था की आपत्तियों का
(4) आदिपद से यहाँ “अभयं सत्त्वसंशुद्धिज्ञिनियोगव्यवस्थिति:” इत्यादि दैवी सम्पत्तियं का
ग्रहण है ।
(५) जिस दिन शुभेच्छा उत्पन्न होती है उस दिन से लेकर प्रतिदिन निरन्तर क्षीण होती जा
रही यह तृष्णा चतुर्थ भूमिका में पहुँचकर बिल्कुल साथ छोड़ देती है । "रसाऽप्यस्य परं दृष्टा
निवर्तते ऐसा भगवान् ने भी कहा है ।
(०) अर्थात् चिड़ियों की नाईं एक शाखा से उड़कर दूसरी पर जा बैठ रही ।
बार-बार स्मरण करके सन्तोषरूपी अमृत से परिपुष्ट होकर अनर्थरूपी अर्थो के (धनों के) नाश में
भी सन्तुष्ट ही होता है