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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 31

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, verse 31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

लोकैषणाविरक्तेन त्यक्तदारैषणेन च । धनैषणाविमुक्तेन तस्मिन्विश्रम्यते पदे ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामचन्द्रजी (५) “अखिलां बुद्धि विहाय” इससे इस योगी की आत्यन्तिक वासना का क्षय और मन का नाश दिखलाया गया है । (=) आवरण का भंग होने से ग्रहण करता है, विक्षेपशून्य स्फुरण होने से स्वाद चखता है, एकमात्र उसी में वृत्ति के स्थित रहने से उसका भोग लगाता है और पूर्णस्थिति होने से तृप्त होता है इस तरह चतुर्थी आदि भूमिकाओं के फलों का 'गृह्यादि” इत्यादिपदों से लाभ दिखलाया गया है । लोक-एषणा, स्त्री-एषणा ओर धन -एषणा (८) से शून्य जो पुरुष है वही उस ब्रह्मपद में विश्राम पाता है