Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 36
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, verse 36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
आत्यन्तिकी विरसता यस्य दृश्येषु दृश्यते ।
स बुद्धो ना प्रबुद्धस्य दृश्यत्यागे हि शक्तता ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
सोकर उठने के बाद जैसे पुरुष को स्वाप्नित पदार्थों में तुच्छ बुद्धि होने से आत्यन्तिक विरक्ति
रहती हैं केसे ही तत्वज्ञानी पुरुष इन सांसारिक गप्रपंचों में आत्यन्तिक विरक्ति कर सकता हैं, इस
आशय से कहते हैं ।
दृश्य पदार्थों में जिस पुरुष की आत्यन्तिक विरक्ति देखी जाती है वही तत्त्वज्ञानी है, क्योंकि
दृश्य प्रपंचों के त्याग में अज्ञानी समर्थ नहीं है