Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, verse 38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
द्रष्टृदृश्यैकतारूपः प्रत्ययो मनसो यदा ।
स तदेकसमाधाने तदा विश्राम्यति स्वयम् ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
(तदेवा्थमात्रनिसि स्वरुपशून्यं समाधिः“ भगवान् पतंजलि के उक्त वचन का भी दष्टा ओर
दृश्य को एक बनाकर उसके द्वारा मन के विलय में ही तात्पर्य है, इस आशय से कहते हैं /
द्रष्टा आदि त्रिपुटी का लय होने से अखण्ड एक आत्माकार में जब मन की वृत्ति स्थित
हो जाती है, तब वह ज्ञानी एक आत्मसमाधि में स्वयं विश्रान्त हो जाता है