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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 43

बयालीसवाँ सर्ग समाप्त तैतालीसवों सर्ग अज्ञानकल्पित यक्षनगर जैसे इस जगत्‌ का शुद्ध तत्वज्ञान से विनाश हो जाने पर एकमात्र ब्रह्म में ही स्थिति हो जाती है यह वर्णन ।

63 verse-groups

  1. Verse 1महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामभद्र, भोक्ता ओर भोग्यरूप यह जो सम्पूर्णं आन्तर अहन्ताद…
  2. Verse 2इरीलिए् तत्वज्ञानियों को भोग्यवर्गो मे रुचि नहीं होती, यह कहते हैं / जो पुरुष अज्ञान से भ…
  3. Verse 3ङस प्रकार भोग्यवरतुओं से जो विरक्त हो गये हैं उनके लिए भोक्‍ता में अहंकाररुपी अंश का एकमा…
  4. Verse 4भोगजल नहीं रुचता, यह जो क गया हैं, उसी को पुनः विशवरूप से कहते हैं । जैसे स्वप्न में दृष्…
  5. Verse 5इस विषय में यन्धर्व-मायाकल्पित नयर द्वष्टान्त है, यह कहते हैं / जैसे यक्ष अपनी भावना से व…
  6. Verse 6यद्यपि भ्रान्तिकल्पित भोक्तारूप होने से विभ्रमरूप यक्ष तथा भ्रान्तिकल्पित भोग्यस्वरूप होन…
  7. Verse 7कष्टान्त ओर दार्शीन्तिक दोनो में अस़त्‌ के भी सत्यरूप से प्रतिभास में आवरणशून्य साक्षी का…
  8. Verse 8यक्ष के अपने कल्पित देह, नयर आदि के उयसहार की तरह जगद्रूप के बाध मे भी उसे एकमात्र निथ्या…
  9. Verse 9सम्पूर्ण कल्पनाओं तथा आशंकाओं से रहित, त्याग तथा ग्रहण से शून्य, बहुत दूर तक जानेवाली समस…
  10. Verse 10विचारपूर्वक देखने से यह दृश्य एकमात्र द्रष्टारूप या दुच्छरूप ही पर्यवसित होता है, यह कहते…
  11. Verse 11द्रष्टा के द्ृश्यस्वरूप न होने पर भी व्यवहार में दरश्यसत्ता की स्यति का निवाह्कि व्रष्टाह…
  12. Verse 12रन्त॒ परमार्थ में तो द्रष्टा के ग्राथ ऐक्य की सम्भावना भी नहीं है, यह कहते हैं / जो यह जग…
  13. Verse 13अब भगवान्‌ वस्निष्ठजी सबके प्रति दया से हितकारक बातें उद्घोषित करते हुए उपदेश देते हैं /…
  14. Verse 14हे मनुष्यों, आप सबके सब बिलकुल शून्य इस संसाररूपी महाजंगल की मरुभूमिया में भ्रान्तचित्त म…
  15. Verse 15हे त्रिलोकीरूपी मृगतृष्णाजल से ठगे गये अतएव नष्टबुद्धि जीवों, आप लोग तृष्णा से चंचलहृदय ह…
  16. Verse 16हे बाह्य तथा आभिमानिक भोगरूपी मृगतृष्णाजलका पान करनेवाले मृगो, तुम लोग व्यर्थ का परिश्रम…
  17. Verse 17हे सभ्यपुरुषों, जगद्रूपी गन्धर्वनगर में विवेक को नष्ट कर देनेवाले गर्व से आप लोग नष्ट न ह…
  18. Verse 18जगद्‌-रूपी केशोण्ड्रक की भ्रान्ति के लिए ब्रह्माकाश के मध्य में अज्ञानरूपी नीलिमा का आप ल…
  19. Verse 19हे मनुष्यों, ऊँची शाखाओं में स्थित पीपल के पत्तों पर गिरे तथा वायु द्वारा कम्पित हुई ओस क…
  20. Verse 20आदि और अन्त से शून्य पारमार्थिक ब्रह्मभाव में आप लोग शान्त हो निरन्तर स्थित रहें । द्रष्ट…
  21. Verse 21अज्ञानीजन ही इस संसार को सत्य समझते हैं । वस्तुतः वह कुछ भी नहीं है । अवशिष्ट जो सत्यवस्त…
  22. Verse 22तृष्णारूपी लोहे की श्रृंखला से वेष्टित संसाररूपी पिंजरे को आत्मज्ञान के बल से जबरदस्ती तो…
  23. Verse 23भै" ओर "मेरा" इस अभिमानरूप भ्रान्ति की एकमात्र शान्ति ही मुक्ति है । इसके सिवा और कोई दूस…
  24. Verse 24अपार संसारमार्गा में निरन्तर चलते रहने के कारण खिन्न हुए पथिको के लिए वही विश्रान्ति का ए…
  25. Verse 25परस्पर कथन के अयोग्य अर्थो से भरे ये जगत्‌ के पदार्थ हैँ । इन्दं तत्त्वज्ञ जैसा समझते हैं…
  26. Verse 26जैसे महासमुद्र से वेष्टित हो समुद्ररूप से स्थित हुई गंगा, गोदावरी और नर्मदा आदि नदीरूप आक…
  27. Verse 27फिर इसीको स्पष्टरूप से कहते हैं / भ्रम के शान्त हो जाने पर सांसारिक स्वरूप से स्थित ही जी…
  28. Verse 28जैसे खूब जला दिये गये तृणों की भस्म का ढेर वायु से उड़कर न जाने किस जगह पर चला जाता है, व…
  29. Verse 29ब्रह्मपद का जो बंहणरूप (वर्द्धनशील) अर्थ है उसी का आकारविशेष जगत्‌ है । वह आकारविशेष यदि…
  30. Verse 30इस संसार के निर्विकल्प का अनुभव कच्चे को भी होता है, उसका साम्य दिखलाते हैं ।/ जिस बच्चे…
  31. Verse 31इन सांग्रारिक पदार्थों का अनुभव तत्वज्ञानियों को जैसा होता हैं कैसा यूर्खों को नहीं और मू…
  32. Verse 32इस्रीकी व्याख्या करते हैं / चूँकि अज्ञानरूप अन्धकार से सभी प्राणी आवृत हैं, इसलिए सुषुप्त…
  33. Verse 33उत्तरार्ध की पुनः व्याख्या करते हैं जन्मान्ध पुरुष को हुए रूपों के अनुभव के सदृश ज्ञानी प…
  34. Verses 34–36मूढ पुरुषों को दुःखरूप से प्रसिद्ध ये तीनों जगत्‌ उन्हीं के लिए हैं, तत्त्वज्ञानी के लिए…
  35. Verse 37बाह्य अर्थो का बाध होने पर बाह्य इन्द्रियों का निरोध हो सकता ह. परन्तु मन का निरोध केसे ह…
  36. Verses 38–41जैसे नदियों के जल जब तक समुद्र में नहीं पहुँचते तब तक नदी, प्रवाह आदि नानाविध आकारो में भ…
  37. Verse 42संसार के सब अर्थ संकल्परूप ही हैं, बुद्धिमान्‌ व्यक्ति को उसकी कभी भी इच्छा नहीं करना चाह…
  38. Verse 43संसार के पदार्थो ओर मन का जो यह बाध है कह स्वप्न में हुए व्याप्रनाश के समान अनष्ट का ही न…
  39. Verse 44ज्ञानी पुरुष की दृष्टि में अर्थ और मन दोनों पारमार्थिक ब्रह्मस्वभाव से ही स्थित हे । वे ज…
  40. Verse 45तत्त्वज्ञ की दृष्टि से सुखादि भोग एवं जगत्‌ को कार्य-कारणरूप से जुटा देने में समर्थ काल,…
  41. Verse 46जैसे धीर-वीर पुरुषकी दृष्टि में पिशाचबुद्धि अस्तित्व नहीं रखती, ऐसे ही ज्ञानी पुरुष की दृ…
  42. Verse 47तब तत्त्वज्ञानी पुरुष जगत्‌ का स्वभाव केला मानते हैं; इस पर कहते हैं / तत्त्वज्ञानी लोग त…
  43. Verse 48बाह्य अर्थो कहे गये जानने के प्रकार को आभ्यन्तर मानिक आर्थो में और समझना चाहिए, यह कहते ह…
  44. Verse 49इस तरह विस्तार के साथ अज्ञानी और तत्त्वज्ञानियों के जयत्‌-ज्ञान के जो दो प्रकार दिखलाये ग…
  45. Verse 50अपनी असली स्थिति जब छुट्ढढ़ हो जाती है, तब जाग्रत्‌ आदि तीनों अवस्थां एकमात्र तुरीय बोधरू…
  46. Verse 51जिसमें अनन्त नानात्व (भेद) उपस्थित है, ऐसे सम्पूर्ण ज्ञेय का विधूनन करके हे श्रीरामचन्द्र…
  47. Verse 52बाह्य ओर आभ्यन्तर पदार्थों के स्वरूप को ज्ञप्ति ही धारण करती है, जैसे कि बीज शाखा तथा फल…
  48. Verse 53ज्ञेय पदार्थो के अभाव से ज्ञप्ति (बुद्धि या वृत्ति) भी अनिर्वचनीय पदको प्राप्त हो चुकी है…
  49. Verse 54पदार्थ ओर मन दोनों का निरूपण एक-दूसरे के अधीन होने स्ने इनमें कोर्ड भेद न रहने पर आखिर मे…
  50. Verse 55तब ऐसी दशा में जग्रत्‌ के पदार्थ ओर मन वे दोनों तत्वतः क्या है / इस पर कहते हैं ब्रह्म के…
  51. Verse 56हे श्रीरामजी, जैसे कारणरहित अर्थों का प्रकाश होता है वैसे ही कारण रहित ही मन भी भासता है…
  52. Verse 57हे श्रीरामचन्द्रजी, एकमात्र मन का स्वरूप होकर आप भी इस संसार में भ्रान्त-से हो रहे हैं एक…
  53. Verse 58यह निश्चित है कि मन से ही यह संसार उत्पन्न होता है और आत्मज्ञान से शान्त हो जाता है । सीप…
  54. Verse 59परन्तु ज्ञान ही परमात्मा का असली स्वरूप है और संसार का अभाव भी ज्ञानरूप ही है । निर्वाण स…
  55. Verse 60तब निवाणि से भिन्न अहय्‌” यह भरमरूय सत्ता किस उपाय से शान्त होती ह वह उपाय बतलाते हैं / म…
  56. Verse 61ऐसा केसे होगा 2 इस पर कहते है/ सृष्टि के प्रारम्भ में ज्ञानमय ब्रह्मा सर्वज्ञ होने के कार…
  57. Verse 62ठीक हैं, ऐसा ही सही, किन्तु इससे प्रक्रत मे क्या आया, इस पर कहते हैं / इससे यह सिद्ध हुआ…
  58. Verse 63सत्ता की एकता मे दूसरा द्रष्टान्त देकर उका उपपादन करते हैं / जैसे लाखों योजनपर्यन्त दूर ए…
  59. Verse 64ज्ञान की निर्मलता में भी यही द्ष्टान्त है, यह कहते है / जैसे सर्वत्र विद्यमान एक आकाश शून…
  60. Verse 65जैसे घनीभूत होकर घी अपने को पाषाणरूप कर लेता है ऐसे ही चेतन विषयरूप होकर अपने को चित्तरूप…
  61. Verse 66बोधरूप आत्मा के अज्ञान से ही देश, काल आदि सामग्री के बिना यह अज्ञानी आत्मा चित्तरूप बन गय…
  62. Verse 67शुद्ध चिदात्मा में यद्यपि अज्ञान आदि का कोई संभव नहीं है, तथापि अज्ञानकाल में एक दूसरों क…
  63. Verse 68चूँकि आविद्या आदि का स्वरूप सर्वथा असभव है इस्नलिए तत्वज्ञान का उदय हो जाने पर अविद्या के…