Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verses 38–41
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, verses 38–41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 38-41
संस्कृत श्लोक
एष एवैष आभासः सबाह्याभ्यन्तरात्मकः ।
आसमुद्रं नदीवाहशतसंघमयात्मकम् ॥ ३८ ॥
यथैकश्लेषपिण्डात्म वहत्यम्बु तरङ्गिणाम् ।
सबाह्याभ्यन्तराकारमर्थानर्थमयात्मकम् ॥ ३९ ॥
मन एव स्फुरत्यर्थनिर्भासं व्याततं तथा ।
नास्त्यर्थमनसोर्द्वित्वं यथा जलतरङ्गयोः ॥ ४० ॥
एकाभावे द्वयोः शान्तिः पवनस्पन्दयोरिव ।
नूनमेकोपशान्त्यैव निःसारे परमार्थतः ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे नदियों के जल जब तक समुद्र में नहीं पहुँचते तब तक नदी, प्रवाह आदि
नानाविध आकारो में भासित होते हैं, किन्तु जब वे समुद्र में जाकर मिल जाते हैं, तब तो एकमात्र
जलरूप ही भासते हैं, वैसे ही बाह्य ओर आभ्यन्तर सम्पूण अर्थ तथा अनर्था का समुदाय जो
स्फुरित होता है वह सब सर्वत्र व्याप्त मन ही स्फुरित होता है, उसी से अर्थो का निभसि होता है ।
मन तथा संसार के पदार्थो में भेद ऐसे नहीं है, जैसे जल ओर तरंगों में भेद नहीं है। (ठीक हैं, ऐसा
ही सही; किन्तु इससे प्रक्रत में क्या आया 2 इस पर कहते है इसलिए मन तथा सांसारिक पदार्थ
इन दोनों में से किसी एकका बाध हो जाने पर दोनों का ही बाध हो जाता है, जैसे कि पवन तथा
उसके स्पन्दन का । इसलिए इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि परमार्थदृष्टि से निःसार इस जगत् में
एकरूप होने के कारण अर्थज्ञ और मन दोनों ही किसी एक की शांति से शान्त हो जाते हैँ । इससे
तत्त्वज्ञान से जब अर्थ का बाध हो जाता है तब मन भी बाधित हो ही जाता है