Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
असत्तासंभवं दृश्यं द्रष्ट्रात्मकमिदं ततम् ।
अथवा नैव द्रष्ट्रात्म सदवाच्यं किमास्यते ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
विचारपूर्वक देखने से यह दृश्य एकमात्र द्रष्टारूप या दुच्छरूप ही पर्यवसित होता है, यह
कहते हैं /
यह सब दृश्य द्रष्टारूप ही व्याप्त है अथवा सत्ता की उत्पत्ति से शून्य द्रष्टारूप भी यह नहीं है,
क्योंकि सत् परमार्थ चिद्रूप द्रष्ट्रतत्तजो अवाच्य है वह क्या तुच्छ दृश्यरूप स्थापित हो सकता है ?
कदापि नहीं । कोई भी सत् को असत्-रूप नहीं बना सकता, यह तात्पर्य हे