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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 50

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, verse 50 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 50

संस्कृत श्लोक

निरर्थिकैव विभ्रान्तिः स्वभावमयमास्यताम् । शुद्धबोधस्वभावस्थैराकाशमिव शारदैः ॥ ५० ॥

हिन्दी अर्थ

अपनी असली स्थिति जब छुट्ढढ़ हो जाती है, तब जाग्रत्‌ आदि तीनों अवस्थां एकमात्र तुरीय बोधरूप बन जाती हे तदनन्तर मन को मनन करनेका कई विषय ही नहीं रह जाता, इससे मन भी शान्त हो जाता है, यह कहते हैं । शरत्काल के कमलों, तारों या मनुष्यों को आकाश की नाई शुद्धज्ञानस्वरूप ब्रह्मस्वभाव में स्थित पुरुषों को जाग्रत्‌, स्वप्न ओर सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं से मन का अनुभव नहीं होता