Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verses 34–36
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, verses 34–36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 34-36
संस्कृत श्लोक
विमूढदुःखं त्रिजगद्विमूढविषयं न सत् ।
स्वप्ने स्वप्नतया ज्ञाते रूपालोकमनःक्रियाः ॥ ३४ ॥
न स्वदन्ते यथा तद्वज्जाग्रत्स्वप्रे स्फुरन्तु मा ।
निर्विभागः समाश्वस्तोऽविरोधं परमागतः ॥ ३५ ॥
आशीतलान्तःकरणो निर्वाणो ज्ञोऽवतिष्ठते ।
तज्ज्ञस्याकृष्टमुक्तस्य समं ध्यानं विना स्थितिः ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
मूढ पुरुषों को दुःखरूप से प्रसिद्ध ये तीनों जगत् उन्हीं के लिए हैं, तत्त्वज्ञानी के लिए
नहीं, क्योकि ये सत् नहीं है । (यदि ज्ञानी के लिए विष्योपभोग नहीं है, तो फिर वह ज्ञानी
किससे तृप्त होकर जीवित रहता है, इस पर कहते हैं // स्वप्नरूप से स्वप्न का ज्ञान हो जाने पर
स्वप्न के बाह्य और आभ्यन्तर विषय जागे हुए पुरुष को जैसे नहीं रुचते, वैसे ही यद्यपि जाग्रत्-
स्वप्न के भोग नहीं रुचते, फिर भी वह सारे भेदों से रहित, सबके विश्वास के, श्रद्धा के भाजन
परम ऐक्य को प्राप्त, निर्वाणस्वरूप होकर सर्वदा मन में पूर्ण शान्ति का अवलम्बन कर ही अवस्थित
रहता है। भोगों की वासनाओं द्वारा चित्त का बाहर आकर्षण न होने के कारण ज्ञानी की स्थिति
ध्यान के चित्तनिरोध के लिए किये जानेवाले प्रयत्न के बिना भी समान ही रहती है (ठसका
द्ष्टान्त द्वार उपपादन करते है ८ ठीक ही है नाली आदि निम्नमार्ग के बिना तालाब आदि के
जल की प्रवाह आदि क्रिया कुछ हो नहीं सकती