Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
परिज्ञाता यथा स्वप्ने पदार्था रसयन्ति नो ।
न च सन्ति तथैवास्मिन्नहं जगदिदंभ्रमे ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
भोगजल नहीं रुचता, यह जो क गया हैं, उसी को पुनः विशवरूप से कहते हैं ।
जैसे स्वप्न में दृष्टिगोचर हुए पदार्थ जगे हुए पुरुष को किसी तरह का आनन्द प्रदान नहीं
करते और न उसकी दृष्टि में वे अपना अस्तित्व ही रखते हैं वैसे ही भे" “यह जगत्" इत्यादि
भ्रम में देखे गये पदार्थ न तो तत्त्वज्ञानी को आनन्द प्रदान करते हैं और न उसकी दृष्टि में
अपना अस्तित्व ही रखते हैं