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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

अनावरणतोऽरण्ये यक्षा विभ्रमरूपिणः । यथा स्फुरन्ति भूतानि तथेमानि चतुर्दश ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

कष्टान्त ओर दार्शीन्तिक दोनो में अस़त्‌ के भी सत्यरूप से प्रतिभास में आवरणशून्य साक्षी का अध्यास ही निमित्त है इस आशय से कहते है/ जैसे जंगल में यक्ष आदि विभ्रमरूप ही स्फुरित होते हैं वैसे ही आवरण न रहने से ये चौदह भुवन भी स्फुरित होते हैं । तात्पर्य यह किं आवरणरहित साक्षी में अध्यास के कारण ही ये चौदह भुवन स्फुरित होते हैं