Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 33
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, verse 33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
जात्यन्धरूपानुभवसमं भुवनवेदनम् ।
भ्रान्तप्रायमसद्रूपं ज्ञस्य भाति न भाति च ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
उत्तरार्ध की पुनः व्याख्या करते हैं
जन्मान्ध पुरुष को हुए रूपों के अनुभव के सदृश ज्ञानी पुरुष को जगत् का अनुभव यदि
होता है, तो वह रात्रिस्वप्नवत् होता है और यदि नहीं होता, तो निशासुषुप्त के समान होता
है