Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 51
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, verse 51 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 51
संस्कृत श्लोक
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तान्तैर्मनस्त्वं नानुभूयते ।
विधूयानन्तनानात्वमसद्भावमनामये ॥ ५१ ॥
हिन्दी अर्थ
जिसमें अनन्त नानात्व (भेद) उपस्थित है, ऐसे सम्पूर्ण ज्ञेय का विधूनन करके हे श्रीरामचन्द्रजी,
रज्जू में अध्यस्त सर्प का विधूनन कर अपने स्वरूप में स्थित रज्जू की नाई आप भी अपने चिद्घन
स्वभाव में स्थित हो जाइये