Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
अज्ञानज्वरमुक्तस्य बोधशीतलितात्मनः ।
एतदेव भवेच्चिह्नं यद्भोगाम्बु न रोचते ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
इरीलिए् तत्वज्ञानियों को भोग्यवर्गो मे रुचि नहीं होती, यह कहते हैं /
जो पुरुष अज्ञान से भलीभाँति मुक्त हो गया है तथा जिसकी आत्मा बोध से शीतल हो चुकी
हैं, ऐसे महानुभव का यही चिह्न है कि उसे भोगजल रुचता नहीं