Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 47
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, verse 47 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
ज्ञमज्ञो भावयत्यज्ञं चिरं वन्ध्यापि वर्धते ।
विनैव ज्ञातशब्दार्थमर्थभावमिवागतम् ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
तब तत्त्वज्ञानी पुरुष जगत् का स्वभाव केला मानते हैं; इस पर कहते हैं /
तत्त्वज्ञानी लोग तो ज्ञेयरूप न होते हुए भी स्वप्रकाशस्वरूप होने से ही अर्थभास की तरह
स्थित यानी भासमान (ज्ञेयरूप) तथा आदि और अन्त से शून्य ब्रह्मरूप बोध को संसार का
असली स्वभाव कहते हैं