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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 68

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, verse 68 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 68

संस्कृत श्लोक

महानुभावा विगताभिमाना विमूढभावोपशमे गलन्ति । निर्भ्रान्तयोऽनन्ततयैव शान्ता नित्यं समाधानमया भवन्ति ॥ ६८ ॥

हिन्दी अर्थ

चूँकि आविद्या आदि का स्वरूप सर्वथा असभव है इस्नलिए तत्वज्ञान का उदय हो जाने पर अविद्या के साथ सब पदार्थ यल जाते हैं / इस तरह उपहार करते हैं / हे श्रीरामचन्द्रजी, तत्त्वज्ञान से मूलअज्ञान के शान्त हो जाने पर महानुभाव लोग अभिमानरहित हो धी की तरह अपने स्वरूप में ही गलित हो जाते हैं तथा गल जाने से वे निरतिशयानन्दपूर्णभाव से शान्त होते हुए विक्षेपरहित हो निरन्तर समाधिरूपी विश्रान्ति में तत्पर होते हैँ