Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 62
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, verse 62 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 62
संस्कृत श्लोक
गतं स्वमत्यजद्रूपं तरङ्गत्वं यथा पयः ।
मूलशाखाग्रपर्यन्ता सत्ता विटपिनो यथा ॥ ६२ ॥
हिन्दी अर्थ
ठीक हैं, ऐसा ही सही, किन्तु इससे प्रक्रत मे क्या आया, इस पर कहते हैं /
इससे यह सिद्ध हुआ कि मूल से लेकर शाखा के अग्रभाग तक वृक्ष की जैसे एक ही सत्ता है वैसे
ही ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेयरूप जगत् में भी अत्यन्त निर्विकारभाव को प्राप्त ज्ञेयपर्यन्त एक ही ज्ञप्ति
की (ज्ञानस्वरूप ब्रह्म की) सत्ता सर्वत्र भास रही है, दूसरी सत्ता नहीं है