Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 46
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, verse 46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
पार्श्वसुप्तनरस्वप्न इव क्लीबाग्रयक्षवत् ।
ज्ञस्य साज्ञं जगन्नास्ति वीरस्येव पिशाचधीः ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे धीर-वीर पुरुषकी दृष्टि में पिशाचबुद्धि
अस्तित्व नहीं रखती, ऐसे ही ज्ञानी पुरुष की दृष्टि में अज्ञानियों के समस्त जगत् भी अस्तित्व नहीं
रखते । अज्ञानी पुरुष ज्ञानी को भी बहुतकाल तक अज्ञानी समझता है । ठीक ही है, अज्ञानी की
दृष्टि से तो वन्ध्या भी पुत्र-पौत्र आदि परम्परा से बढती -रहती है