Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
स्थितमेवाऽविरामी यज्जाग्रदस्य सुषुप्तवत् ।
चित्रावलोकित इव जाग्रत्योऽस्य रसैषणाः ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
इस्रीकी व्याख्या करते हैं /
चूँकि अज्ञानरूप अन्धकार से सभी प्राणी आवृत हैं, इसलिए सुषुप्त की तरह स्थित आत्मतत्त्व
ही इस तत्त्वज्ञानी पुरुष के लिए अविरत जागरणरूप है, इसी दृष्टि से या “निशा सर्वभूतानां तस्यां
जागर्ति संयमी" यह कहा गया है और चूँकि मूढ जनों में जाग्रद्रूप से प्रसिद्ध शब्दादिविषयास्वाद
चित्र में देखे गये युद्धादि की तरह सामने स्थित रहते हुए भी इस तत्त्वज्ञानी की दृष्टि में नहीं रहते
इसलिए “यस्यां जागर्ति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः" यह कहा गया है