Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
यथा स्वभावनाद्यक्षस्तरौ सस्वजनं पुरम् ।
पश्यत्यसत्यमेवैवं जीवः पश्यति संसृतिम् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
इस विषय में यन्धर्व-मायाकल्पित नयर द्वष्टान्त है, यह कहते हैं /
जैसे यक्ष अपनी भावना से वृक्ष मे अपने स्वजन से युक्त असत्य नगर को देखता है वैसे ही
जीव अपनी अविद्या से असत्य ही इस विशाल संसार को देखता है