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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 43

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, verse 43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 43

संस्कृत श्लोक

मनश्च सम्यग्ज्ञानेन शान्तिरेवं भवेत्तयोः । अनष्टे नश्यतश्चैतै ज्ञस्यार्थमनसी स्वतः ॥ ४३ ॥

हिन्दी अर्थ

संसार के पदार्थो ओर मन का जो यह बाध है कह स्वप्न में हुए व्याप्रनाश के समान अनष्ट का ही नाश है, यह कहते हैं / भद्र, ज्ञानी पुरुष के अर्थ और मन अनष्ट ही नष्ट हो जाते हैं अर्थात्‌ जब अर्थ और मन की कभी उत्पत्ति ही नहीं हुई, तब उनका नाश ही क्या ? इसलिए वे अनष्ट ही है । जैसे कि किसी एक मिट्टी की मूर्ति में भ्रान्ति से कोई एक पुरुष अपने शत्रु की कल्पना कर लेता है, किन्तु ज्ञान से जब उसको मिट्टी की मूर्ति मालूम पड़ जाती है, तब वह मूर्ति न शत्रुरूप ही रहती है ओर न शत्रुजनित भय की कारण ही होती है, बस वही स्थिति यहाँ पर भी है