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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 27

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 27

संस्कृत श्लोक

भ्रान्तिशान्तौ प्रबुद्धस्य विनिर्वाणस्य विश्वता । यथास्थितैव गलिता विद्यते च यथास्थितम् ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

फिर इसीको स्पष्टरूप से कहते हैं / भ्रम के शान्त हो जाने पर सांसारिक स्वरूप से स्थित ही जीवन्मुक्त ज्ञानी के लिए यह संसाररूप भी उपलब्ध नहीं होता उसके लिए तो अपने स्वरूप में स्थित एकमात्र परब्रह्म परमात्मा ही विद्यमान रहता है