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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । अहंतादिजगच्चेदं परिज्ञानादसत्यताम् । याति सानुभवो मोहात्सत्यमेवान्यथाधियाम् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामभद्र, भोक्ता ओर भोग्यरूप यह जो सम्पूर्णं आन्तर अहन्तादि और बाह्य जगत्‌ है वह सब तत्त्वज्ञान से (जगदनुभवरूप भोग के स्वरूपज्ञान से) असत्य बन जाता है । जो भोग होता है उसका अवसाद चिति से ही होता है । वह भोक्ता ओर भोग्य के सम्बन्ध का अनुभव है । उसी अनुभव से मोह के द्वारा आत्मा और अनात्मा के धर्मो को एक दूसरे में समझनेवाले यानी भोक्ता में ही आत्मबुद्धि रखनेवाले मूढो को बाह्य जगत्‌ का भोग होता है, स्वतः नहीं । इसलिए परमार्थदशा में बाह्य ओर आभ्यन्तर जगत्‌ का अनुभव ब्रह्मरूप ही है

सर्ग सन्दर्भ

बयालीसवाँ सर्ग समाप्त तैतालीसवों सर्ग अज्ञानकल्पित यक्षनगर जैसे इस जगत्‌ का शुद्ध तत्वज्ञान से विनाश हो जाने पर एकमात्र ब्रह्म में ही स्थिति हो जाती है यह वर्णन ।