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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 54

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, verse 54 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 54

संस्कृत श्लोक

शान्ताशेषविशेषात्मा तेन शेषोऽस्ति सत्स्वभाः । अर्थ एव मनस्कारः स चाभावात्मको भ्रमः ॥ ५४ ॥

हिन्दी अर्थ

पदार्थ ओर मन दोनों का निरूपण एक-दूसरे के अधीन होने स्ने इनमें कोर्ड भेद न रहने पर आखिर में एकमात्र श्रान्ति ही इनमें सिद्ध होती है, यह कहा है / अर्थ ही मन है और वह अभावरूप भ्रम है तथा मन ही जगत्‌ के पदार्थ रूप से परिणत होता है और वह भी अभावरूप भ्रम ही है