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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 102

एक सी एकवाँ सर्ग समाप्त एक सौ दोवोाँ सर्ग॑ तत्त्ज्ञानी की लक्षणावलिका, जिसके दृढ़ अभ्यास से बोध दृढ़ हो जाय, पुनः वर्णन।

62 verse-groups

  1. Verse 1श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे ब्रह्मन्‌, आदि और अन्त से शून्य परम तत्त्व ब्रह्म वस्तु का भल…
  2. Verse 2श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, ज्ञेय वस्तु का जिसे भलीभाँति परिज्ञान हो चुका ह…
  3. Verse 3उन लक्षणो में स्वभावभूत आभ्यन्तर लक्षणों को पहले कहने के लिये उपक्रम करते हैं। हे श्रीराम…
  4. Verse 4महान्‌ राज्य में स्थित रहने पर भी उस पुरुष के लिए मनुष्यों से ठसाठस भरा स्थान भी बिल्कुल…
  5. Verse 5उसके लिए असमाधि भी समाधि है, दुःख को ही वह महान्‌ सुख समझता है, उसका वाचिक व्यवहार होनेपर…
  6. Verse 6वह जाग्रदवस्था में स्थित रहने पर भी सुषुप्त सदृश निर्विकल्पात्मा में स्थित रहता है । जीवि…
  7. Verse 7उसकी विषयसुखों में एकमात्र आत्मसुख की दृष्टि रहती है, इसलिए वह रसिक है, किन्तु विषयदृष्टि…
  8. Verse 8†किमाचारोऽवतिष्ठते“ इससे पूछे यये बाह्य लक्षणों का वर्णन करते है / सर्वाभिनन्दित आचारों स…
  9. Verse 9न तो उस जीवन्मुक्त प्राणी से संसार भयभीत होता है और न वही संसार से भयभीत होता है । अन्य ज…
  10. Verse 10वह जीवन्मुक्त पुरुष सम्प्राप्त हुई वस्तु का न तो अभिनन्दन करता है, और न अप्राप्त की अभिला…
  11. Verse 11किसी दुःखी प्राणी को देख लेने पर उसके साथ बैठकर उससे दुःखित कथा तथा किसी सुखसम्पन्न पुरुष…
  12. Verse 12सुकृत कर्म से अन्य उसे कुछ भी अच्छा नहीं लगता है। हे श्रीरामचन्द्रजी, अशास्त्रीय चेष्टा स…
  13. Verse 13वह जीवन्मुक्त महात्मा न तो किसी में आसक्ति का अवलम्बन करता है और न कहीं विरक्ति का ही अवल…
  14. Verse 14शास्त्रानुकूल व्यवहार से क्रमश: प्राप्त हुए सुख -दुःखों से संस्पृष्ट न होने पर भी उनका स्…
  15. Verse 15चुख ओर दुःख से वह एक तरह से स्फृष्ट-सा होता है, यह जो ऊपर कहा है, उम्रका हेतु के अवर्शन द…
  16. Verse 16हे श्रीरामचन्द्रजी, तत्त्वदर्शी महात्माओं को मिथ्याभूत पुत्र आदि अलीक पदार्थसमूहों से ऐसे…
  17. Verse 17स्नेहरहित होने पर भी तत्त्वज्ञानी पुरुष सुघन स्नेह से आर्द्र हृदयवाले के समान यथायोग्य अप…
  18. Verse 18परन्तु अज्ञानी लोग तत््वज्ञानियों की तरह अनामक्तिपूर्वक विषयो का भरोग करना नहीं जानते, यह…
  19. Verse 19तत्त्वज्ञानी पुरुष बाहर से समस्त शिष्टों के आचारों को करता हुआ भी भीतर समस्त अर्थो से शीत…
  20. Verse 20उक्त लक्षणों से तत्वज्ञानी का परिचय होना बड़ा कठिन है / क्योकि मूर्ख दाम्भिक, कंचक; तपसवी…
  21. Verse 21हे मुने, अश्व की तरह ब्रह्मचर्यव्रत का परिपालन करते हुए कलुषित चित्तवाले अज्ञानी दाम्भिक…
  22. Verse 22अपने को तपस्वी बतलाने के लिए ढ़ किए गये इन लक्षणों का फल शुभ ही होता है, इसलिए उन लक्षणों…
  23. Verse 23वीतराग तथा क्रिया के फलों मे आसक्तिशून्य भी वे जीवन्मुक्त पुरुष रागी के समान चेष्टा करते…
  24. Verse 24वे लोग समस्त दृश्य को चित्तरूपी दर्पण में प्रतिबिम्बित कपट भूमि के तुल्य ऐसे ही असत्‌ देख…
  25. Verse 25जैसे चन्दन की लकड़ी की सुगन्ध को कृमि, कीट आदि जन्तु दूर से नहीं जान पाते, वैसे ही इनकी उ…
  26. Verse 26यद्यपि तत्त्वज्ञानी के स्वरू को अज्ञानी नहीं जान सकते तथापि तत्त्वज्ञानी तो अवश्य ही जानत…
  27. Verse 27दाभ्मिक लोग सर्वत्र अपने में तत्वज्ञ के लक्षणों का प्रचार करते फिरते हैं; परन्तु जो सचमुच…
  28. Verse 28जैसे बेचने के (लिए बाजार में फेलाई यह चिन्तामणि को कोड भी नहीं कह सकता कि यह असली चिन्ताम…
  29. Verse 29हे श्रीराचन्द्रजी, उन महात्माओं को एकान्त सेवन, सत्कार एवं पूजन आदि का अभाव, दरिद्रता तथा…
  30. Verse 30विदितवेद्यता का (तत्त्वज्ञता का) जो सार (निरतिशय आनन्दरूप सार) है, वह एकमात्र स्वानुभव से…
  31. Verse 31मेरे इस गुण को संसार जाने और मेरी पूजा करे, यह अभिलाषा अहंकारियों को होती है, जीवन्मुक्त…
  32. Verse 32हे राघव, इस संसार में आकाशगमन आदि जो क्रियाफल हैं, वे सब मंत्र, औषधि के वश से अज्ञानियों…
  33. Verse 33जो जैसा क्लेश सहन करने में समर्थ है, वैसा ही वह अवश्य फल प्राप्त करता है, चाहे वह प्रबुद्…
  34. Verse 34चन्दन के आमोद की तरह विहित और निषिद्ध कर्मों का फल सभी जन्तुओं के अपने हृदय में ही अपूर्व…
  35. Verse 35सिद्धिरूप दृश्य वस्तुओं में “म भोक्ता होऊँ” इस प्रकार अहन्ता वासनादिरूप परिच्छिन्न आत्मकल…
  36. Verse 36जो ज्ञानी यह सब आकाशगमन आदि सिद्धिसमूह तुच्छ है और मनोभ्रममात्र है अथवा अधिष्ठान चिदाकाशम…
  37. Verse 37तत्त्वज्ञानी का इस संसार में न तो कर्म से ही कोई प्रयोजन है और न कर्म के अभाव से कोई प्रत…
  38. Verse 38पृथिवी पर, स्वर्ग में देवताओं में, अन्तरिक्ष या कहीं पर भी ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो उदार…
  39. Verse 39जिसके लिए सारा संसार तृण के बराबर है, जिसमें रजोगुण का लेश भी नहीं है, उस धीर तत्त्वज्ञान…
  40. Verse 40लोकसंग्रह के लिए जगत्‌ के व्यवहारो का निर्वाह करनेवाले परिपूर्णमना मननशील, जीवन्मुक्त पुर…
  41. Verse 41अन्तःकरण में शीतल, मौनी, सत्वगुणमय मनवाला ज्ञानी पुरुष सर्वदा परिपूर्ण सागर के समान गम्भी…
  42. Verse 42तत्त्वज्ञानी पुरुष अमृत से भरे सरोवर के समान अपने आत्मा मेँ स्वयं आनन्द की हिलोरे लेता रह…
  43. Verse 43वह अन्य को आनन्द प्रदान करता है इसका स्पष्ट रूप से वर्णन करते हैं / मन्दार की मंजरी के कु…
  44. Verse 44सारग्राही विवेकी पुरुष ग्रीष्म ऋतु सम्बन्धी आलोकभोगियों में चन्द्रबिम्बों से, सुगंधभोगियो…
  45. Verse 45तत््वज्ञानी किस सार का ग्रहण करता है, यदि कड यह पूछे, तो इसका उत्तर यह हैं कि वह सबसे पहल…
  46. Verse 46तत्यश्वात्‌ शीतोष्णादि इन्द्र की सहिष्णुतारूप यानी सर्दी-यर्मी का जो सहन करना है. तद्रू स…
  47. Verse 47तदनन्तर समस्त शर्तों के ऊपर अनुकम्पास्वरुप दृढ़ अवलम्बन, यथाप्राप्त जलमात्र से भी सन्तोष…
  48. Verse 48यथाप्राप्त लोकसामान्य व्यवहार का सम्पादन करता हुआ वह जीवन्मुक्त विवेकीपुरुष समस्त चराचर प…
  49. Verse 49ज्ञानी की ऊपर स्थिति कैसे रहती है, यह दिखलाते हैं / तत्त्वज्ञानी पुरुष प्रज्ञारूपी महल के…
  50. Verse 50उती समय वह विरकाल से पीछे पड़े रागादि विकषेपरूप दुख से मुक्त होकर परम विश्रान्ति प्राप्त…
  51. Verse 51प्राक्तन संसार की गतियो को अतिशान्त वृत्ति से हसता हुआ तथा गाढ़ भ्रम से परिपूर्ण यानी महा…
  52. Verse 52ये असद्रूप सांसारिक दृष्टियाँ, जो जंगल में रास्ता न मिलने से अन्धा बनकर इधर-उधर भटक रहे अ…
  53. Verse 53यह मेरा परम सौभाग्य है कि अष्टविध परिपूर्ण ऐश्वर्य मुझे अनिष्ट तथा तृण के समान अवभासित हो…
  54. Verse 54ज्ञानी के स्थानादि का नियम नहीं है यह कहते हैं / कोई ज्ञानी पुरुष पर्वतों की गुफा को अपना…
  55. Verse 55कोई भिखमंगों के आचरण से युक्त हो पर्यटन करता है, तो कोई एकान्त में तपस्वी बनकर रहता है, त…
  56. Verse 56कोई विख्यात पण्डित होता है, तो कोई श्रुति-स्मृति का श्रोता भी दीखता है । कोई राजा, तो कोई…
  57. Verse 57कोई गुटिका, अंजन या खड्ग आदि से सिद्ध होकर आकाशगामी बना रहता है तो कोई शिल्प कला से अपनी…
  58. Verse 58कोई समस्त आचारो से शून्य होता है, तो कोई आचार-अनुष्ठान मेँ श्रोत्रियो का नायक होता है, को…
  59. Verse 59श्रीरामचन््रजी के प्रश्नवाक्य में कद्ध पुरुषोत्तमः” इस पद को सुनकर उसके अर्थ की जिज्ञासा…
  60. Verse 60यह चेतन पुरुष किसी से छेदा नहीं जा सकता, कोई इसे जला नहीं सकता, कोई इसे जल से भिगा नहीं स…
  61. Verse 61ऐसे पुरुषोत्तम के तत्वपरिज्ञान से वह स्वयं भी तत्त्वज्ञानी पुरुष पुरुषोत्तम है, न कि वर्ण…
  62. Verse 62तत्त्वज्ञानी पुरुष जबर्दस्ती स्वयं नष्ट हो जाने की इच्छा से पाताल में प्रवेश कर जाय, आकाश…