Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
कर्मणः सुकृतादन्यदस्मै किंचिन्न रोचते ।
स्वभाव एव महतां ननु यन्न विचेष्टितम् ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
सुकृत कर्म से अन्य उसे
कुछ भी अच्छा नहीं लगता है। हे श्रीरामचन्द्रजी, अशास्त्रीय चेष्टा से जो शून्य होना है वह उन
महात्माओं का स्वभाव ही है, अर्थात् महात्मा का यह स्वभाव ही है कि वे लोग शास्त्रवर्जित चेष्टा
कभी नहीं करते