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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 47

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, verse 47 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 47

संस्कृत श्लोक

करुणोदारया वृत्त्या वृत्त्या व्रततिधीरया । नीरसो नीरसारां तु सारतां सरति स्थितिम् ॥ ४७ ॥

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर समस्त शर्तों के ऊपर अनुकम्पास्वरुप दृढ़ अवलम्बन, यथाप्राप्त जलमात्र से भी सन्तोष कर लेना इत्यादि जो गुण हैं; तद्रू सार को ग्रहण करता है, यह कहते हैं । एकमात्र दूसरे के उपयोग के लिए पुष्प-फल आदि धारण करनेवाली लता के सदृश, करुणा के कारण उदार वृत्ति से अन्य दुःखी प्राणी का परिपालन करता है तथा स्वयं विरक्त होकर वह, जो मिल जाय उससे सन्तोष कर लेना इस तरह की उत्तम वृत्ति से जिसमें सन्तोष का हेतु एकमात्र जल ही रहता है, वैसी वृत्ति से स्थितिरूप सारता को प्राप्त करता है