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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 28

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, verse 28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 28

संस्कृत श्लोक

तस्मिन्निगूहने भावो यतस्तेषां न दर्शने । निर्वासना गतद्वैता गतमानाः किलाङ्ग ते ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे बेचने के (लिए बाजार में फेलाई यह चिन्तामणि को कोड भी नहीं कह सकता कि यह असली चिन्तामणि है वैसे ही जबर्दस्ती अपने गुण का प्रकार करने करानेवालों को सी लोग जान जाते हैं कि यह कार्मिक है -संस्रार को धोखा देता हे / वस्तुतः यह तत््वज्ञानी नहीं है, इस आशय से कहते हैं / हे श्रीरामचन्द्रजी, उन तत्त्वज्ञानी महानुभावों का अपने गुणों को छिपा रखने में ही तात्पर्य रहता है । दूसरों द्वारा अपनी सर्वत्र ख्याति कराने में नहीं, क्योकि वे लोग वासना से शून्य, द्वैतरहित एवं अभिमान से रहित होते हैं इसमें सन्देह नहीं हे