Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 42
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, verse 42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
रसायनपरापूर्णहृदवत् ह्लादमात्मनि ।
धत्ते करोति वान्यस्य सकलेन्दुरिवामलः ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
तत्त्वज्ञानी पुरुष अमृत से भरे
सरोवर के समान अपने आत्मा मेँ स्वयं आनन्द की हिलोरे लेता रहता है तथा निर्मल परिपूर्ण
चन्द्रमा के समान दूसरे को भी आनन्द प्रदान करता रहता है