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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 36

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, verse 36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 36

संस्कृत श्लोक

इदं न किंचिद्भ्रान्तिर्वा खं चेति ज्ञस्तु वेत्ति यः । सोऽवासनः कर्मवात्याः कथं साधयति क्रियाः ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

जो ज्ञानी यह सब आकाशगमन आदि सिद्धिसमूह तुच्छ है और मनोभ्रममात्र है अथवा अधिष्ठान चिदाकाशमात्र है यह जानता है, वह वासनाशून्य तत्त्वज्ञ पुरुष कर्मरूपी आँधी से भ्रमणप्राय आकाशगमन आदि सिद्धिफलवाली मन्त्र-ओषधि आदि क्रियाओं की क्यों सिद्धि करने जायेगा