Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 61
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, verse 61 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 61
संस्कृत श्लोक
इति सम्यक्प्रबुद्धो यः स यथा यत्र तिष्ठति ।
तथा तिष्ठतु तत्रात्र स्थानास्थानियमेन किम् ॥ ६१ ॥
हिन्दी अर्थ
ऐसे पुरुषोत्तम के तत्वपरिज्ञान से वह स्वयं भी तत्त्वज्ञानी पुरुष पुरुषोत्तम है, न कि वर्णाश्रम
मर्यादा का परिपालन करने से, क्योंकि वर्णाश्रम मर्यादा का पालन न करने पर भी उसकी पुरुषोत्तमता
(&) वह कभी भी नष्ट नहीं होता, इसलिए वह अविनाशी है, अतः वही उत्तम है ।
(५) छेदन, भेदन आदि विनाश के कारणों का संस्पर्श न रहने से भी वही उत्तम है ।
में किसी प्रकार की हानि नहीं होती, इस आशय से कहते ढै/
इस प्रकार अच्छी तरह जो प्रबुद्ध हो गया वह जहाँ जैसे रहना चाहे वैसे ही यहाँ या वहाँ जहाँ
कहींपर स्थित रहे, उसको वर्णाश्रम धर्म की मर्यादा के परिपालन में आस्था रखने से या किसी तरह
के नियम से कोई मतलब नहीं है