Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 54

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, verse 54 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 54

संस्कृत श्लोक

कश्चिद्गिरिगुहागेहः कश्चित्पुण्याश्रमाश्रयः । कश्चिद्गृहस्थाश्रमवान्कश्चिद्वहुरटन्स्थितः ॥ ५४ ॥

हिन्दी अर्थ

ज्ञानी के स्थानादि का नियम नहीं है यह कहते हैं / कोई ज्ञानी पुरुष पर्वतों की गुफा को अपना घर बनाकर उसमें रहता है, कोई पवित्र आश्रम में रहता है, कोई गृहस्थ आश्रम में ही रहता है और कोई ज्ञानी तो सदा इधर-उधर घूमता रहता है । ज्ञानी पुरुष का कोई एक नियत स्थान नहीं रहता