Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
अन्तःशीतलतामेषां तां न जानन्ति केचन ।
दूराच्चन्दनदारूणामामोदमिव जन्तवः ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे चन्दन की लकड़ी की सुगन्ध को कृमि, कीट आदि जन्तु
दूर से नहीं जान पाते, वैसे ही इनकी उस अन्तःकरण की शीतलता को कोई नहीं जान पाते