Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, verse 34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
आमोदश्चन्दनस्येव स्पन्दनस्य फलं हृदि ।
सर्वस्यैवास्ति तन्नूनं तद्वता समवाप्यते ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
चन्दन के
आमोद की तरह विहित और निषिद्ध कर्मों का फल सभी जन्तुओं के अपने हृदय में ही अपूर्वरूप
से विद्यमान है । समय पाकर आविर्भूत हुए उसे अवश्य तद्वान् जन्तु प्राप्त करता है