Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 29
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, verse 29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
एकान्तामानदौर्गत्यजनावज्ञप्तयस्तु तान् ।
सुखयन्ति यथा राम न तथैव महर्द्धयः ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीराचन्द्रजी, उन महात्माओं
को एकान्त सेवन, सत्कार एवं पूजन आदि का अभाव, दरिद्रता तथा मनुष्यों द्वारा अपमान - ये
सब जैसे सुखी बनाते हैं वैसे बड़ी-बड़ी ऋद्धि-सिद्धियाँ सुखी नहीं बनातीं, क्योंकि सम्मान तथा
धन आदि की समृद्धि होने पर जनसमाज के द्वारा प्राप्त हजारों प्रतिष्ठा आदि से तत्त्वज्ञानी के
आत्मसुखानुभव में विच्छेद पड़ने लगता है