Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 9
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
तस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते तु सः ।
परमुद्वेगमापन्नः संसृतौ रसिकोऽपि सन् ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
न तो उस जीवन्मुक्त प्राणी से संसार भयभीत होता है और न वही
संसार से भयभीत होता है । अन्य जनकी दृष्टि में संसार मे रसिक (अनुरक्त) होकर भी वह संसार
से परम उद्विग्न यानी वैराग्य को प्राप्त हुआ रहता है